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Siyasat Shayari in Hindi


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Bulandi ka nasha simton ka jaadoo tod deti hai,
Hawa udate huye panchhi ke baajoo tod deti hai,
Siyaasi bhediyo thhodi bahut ghairat jaroori hai,
Tawayaf bhi kisi mauke pe ghunghroo tod deti hai.

बुलंदी का नशा सिमतों का जादू तोड़ देती है,
हवा उड़ते हुए पंछी के बाज़ू तोड़ देती है,
सियासी भेड़ियों थोड़ी बहुत गैरत ज़रूरी है,
तवायफ तक किसी मौके पे घुंघरू तोड़ देती है !

Siyasat iss kadar aawam pe ehsaan karti hai,
Aankhein chheen leti hai fir chashme daan karti hai.

घरों पर नाम थे नामों के साथ ओहदे थे,
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
बशीर बद्र !

जिसके किरदार पे शैतान भी शर्मिंदा है,
वो भी आये हैं यहां करने नसीहत हमको
माजिद देवबंदी !

इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे,
रौशनी ख़त्म न कर आगे अंधेरा होगा
निदा फ़ाज़ली !

ख़ुद-कुशी करती है आपस की सियासत कैसे,
हम ने ये फ़िल्म नई ख़ूब इधर देखी है
गोपालदास नीरज !

सियासत इस कदर अवाम पे अहसान करती है,
आँखे छीन लेती है फिर चश्में दान करती है !

Hindustaan ki fiza mein jahar ghol raha hoon,
Sabdhaan dosto... main siyasat khor bol raha hoon.

हिन्दुस्तान की फिजा में जहर घोल रहा हूँ,
साबधान दोस्तो... मैं सियासत खोर बोल रहा हूँ।

Na masjid banegi na koi mandir banega,
Agli baar phir chunaav ka mudda banega.

न मस्जिद बनेगी न कोई मंदिर बनेगा,
अगली बार फिर चुनाव का मुद्दा बनेगा !

Siyaasat is kadar avaam pe ahasaan karatee hai,
Aankhe chheen letee hai phir chashmen daan karatee hai !

सियासत इस कदर अवाम पे अहसान करती है
आँखे छीन लेती है फिर चश्में दान करती है !

कई आँखों में रहती है कई बांहें बदलती है,
मुहब्बत भी सियासत की तरह राहें बदलती है...

Chaahate to ham bhee the jeena sharaaphat se,
Siyaasat kya milee, sharaaphat chalee gayee !

चाहते तो हम भी थे जीना शराफत से
सियासत क्या मिली, शराफत चली गयी !

Bulandee ka nasha simaton ka jaadoo tod detee hai,
Hava udate hue panchhee ke baazoo tod detee hai,
Siyaasee bhediyon thodee bahut gairat zarooree hai,
Tavaayaph tak kisee mauke pe ghungharoo tod detee hai !

बुलंदी का नशा सिमतों का जादू तोड़ देती है,
हवा उड़ते हुए पंछी के बाज़ू तोड़ देती है,
सियासी भेड़ियों थोड़ी बहुत गैरत ज़रूरी है,
तवायफ तक किसी मौके पे घुंघरू तोड़ देती है !

उस को मज़हब कहो या सियासत कहो,
ख़ुद-कुशी का हुनर तुम सिखा तो चले
कैफ़ी आज़मी !

Kabhee tha dushman sapera saamp ka par ab saath dekha hai,
Medhakon ko bhee siyaasat mein hamane ek saath dekha hai,
Jis panje ko hamane dekha tha kabhee chhoote hue ambar,
Unhee panjo ko vot ke khaatir gadhon ke saath dekha hai !

कभी था दुश्मन सपेरा सांप का पर अब साथ देखा है,
मेढकों को भी सियासत में हमने एक साथ देखा है,
जिस पंजे को हमने देखा था कभी छूते हुए अम्बर,
उन्ही पंजो को वोट के खातिर गधों के साथ देखा है !

ऐ सियासत तूने भी इस दौर में कमाल कर दिया,
गरीबों को गरीब अमीरों को माला-माल कर दिया।

Ai Siyasat Tu Ne Bhi Iss Daur Mein Kamal Kar Diya,
Gareebon Ko Gareeb Ameeron Ko Maala-Maal Kar Diya.

उस को मज़हब कहो या सियासत कहो,
ख़ुद-कुशी का हुनर तुम सिखा तो चले !

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